- ऐसा रहा सैनिक अनुशासन से ‘खण्डूड़ी हैं जरूरी’ तक का सफर
- उत्तराखण्ड ने केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि राजनीति में ईमानदारी, सैनिक अनुशासन और सार्वजनिक जीवन में मर्यादा का एक सशक्त प्रतीक खो दिया है
मौहम्मद शाह नज़र
उत्तराखण्ड की राजनीति का एक ऐसा अध्याय आज इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया, जिसने दशकों तक सत्ता, सियासत, प्रशासन और जनविश्वास के केंद्र में रहकर अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ी। मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खण्डूरी अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनके निधन के साथ ही उत्तराखण्ड ने केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि राजनीति में ईमानदारी, सैनिक अनुशासन और सार्वजनिक जीवन में मर्यादा का एक सशक्त प्रतीक खो दिया है। राज्य सरकार ने उनके सम्मान में तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है तथा कल हरिद्वार में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
देहरादून की वादियों में 1 अक्टूबर 1934 को जन्मा यह बालक आगे चलकर भारतीय सेना का मेजर जनरल बना, संसद का गंभीर वक्ता बना, केंद्र सरकार का प्रभावशाली मंत्री बना और फिर उत्तराखण्ड की राजनीति का वह चेहरा बना, जिसके नाम पर एक दौर में पूरा चुनाव लड़ा गया, ‘खण्डूड़ी हैं जरूरी।’ वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में यह केवल एक चुनावी नारा नहीं था, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक था कि राजनीति में अब भी कुछ चेहरे ऐसे हैं जिनकी साख सत्ता से बड़ी होती है।
सैनिक परंपरा से गढ़ा व्यक्तित्व
स्वर्गीय जय बल्लभ खण्डूरी और दुर्गा देवी खण्डूरी के संस्कारों में पले भुवन चंद्र खण्डूरी ने प्रारम्भिक शिक्षा के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विज्ञान की पढ़ाई की। युवावस्था में ही उन्होंने राष्ट्रसेवा को जीवन का ध्येय बना लिया और 1954 में भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन प्राप्त किया। इसके बाद उनका जीवन रणभूमियों, सैन्य प्रशिक्षण संस्थानों और रणनीतिक जिम्मेदारियों के बीच आकार लेता गया।
1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में उनकी सक्रिय भूमिका रही। 1971 के युद्ध में सांबा सेक्टर में इंजीनियर रेजिमेंट के कमांडर के रूप में उन्होंने जिस नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया, उसने उन्हें सेना में विशिष्ट पहचान दिलाई।
वे केवल सैनिक नहीं थे, बल्कि सैन्य रणनीति और प्रशासनिक दक्षता के अद्भुत संगम थे। सेना मुख्यालय में डायरेक्टर ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़, इंजीनियर ब्रिगेड कमांडर, चीफ इंजीनियर और अतिरिक्त महानिदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए उन्होंने अपने कार्य से यह सिद्ध किया कि अनुशासन और नेतृत्व साथ-साथ चल सकते हैं। उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए भारत सरकार ने उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया।
सत्ता उनके लिए विशेषाधिकार नहीं, दायित्व था
सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। 1991 में पहली बार गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद बने और फिर कई बार जनता ने उन्हें संसद भेजा। संसद में उनकी छवि शोर मचाने वाले नेता की नहीं, बल्कि तैयारी और गंभीरता के साथ बोलने वाले जनप्रतिनिधि की थी।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भारत के बुनियादी ढांचे के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। गोल्डन क्वाड्रिलेटरल और राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना को गति देने में उनकी निर्णायक भूमिका रही। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाली सड़कों का वह स्वप्न, जिसने भारत की आर्थिक रफ्तार बदली, उसमें खण्डूरी की प्रशासनिक क्षमता स्पष्ट दिखाई देती है।
उत्तराखण्ड की राजनीति और एक सख्त मुख्यमंत्री का उदय
वर्ष 2007 में जब भाजपा ने उत्तराखण्ड में सरकार बनाई, तो पार्टी ने खण्डूरी को मुख्यमंत्री बनाया। उस समय राज्य भ्रष्टाचार, ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल और नौकरशाही की बेलगाम कार्यशैली को लेकर आलोचनाओं में था। खण्डूरी ने सत्ता संभालते ही प्रशासनिक सख्ती का संदेश दिया। उनका स्पष्ट मानना था कि शासन का अर्थ नियंत्रण और जवाबदेही है।
फाइलों में देरी, अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार पर उनकी नाराजगी अधिकारियों के बीच चर्चित थी। कहा जाता है कि किसी अधिकारी के अधूरे कार्य के साथ बैठक में पहुँचने का अर्थ था कठोर सवालों का सामना करना। उनकी कार्यशैली ने आम जनता के बीच विश्वास पैदा किया, लेकिन सत्ता और संगठन के भीतर असहजता भी बढ़ाई। राजनीति जिस लचीलेपन की मांग करती है, खण्डूरी कई बार उससे दूर दिखाई देते थे। वे सत्ता को सैन्य अनुशासन की दृष्टि से देखते थे, जबकि राजनीति समझौतों, समीकरणों और संतुलनों का संसार है।
सारंगी व भाजपा के भीतर पनपे असंतोष से गवाई थी कुर्सी
उनके राजनीतिक जीवन का सबसे विवादास्पद अध्याय उनके करीबी सचिव सारंगी को लेकर उठा विवाद बना। विपक्ष ने आरोप लगाए कि मुख्यमंत्री कार्यालय में निर्णय प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई है और कुछ चुनिंदा लोगों का प्रभाव बढ़ रहा है। वहीं, कई नेताओं को शिकायत थी कि मुख्यमंत्री तक उनकी पहुँच सीमित होती जा रही है। धीरे-धीरे राजनीतिक दबाव बढ़ा और अंततः 2009 में उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। यह विडंबना थी कि जिस नेता की ईमानदारी पर शायद ही कभी प्रश्न उठा, वही राजनीतिक प्रबंधन के आरोपों में घिर गया।
फिर क्यों जरूरी हो गये खण्डूरी?
समय बीता, लेकिन उत्तराखण्ड की राजनीति में खण्डूरी की स्वीकार्यता कम नहीं हुई। 2011 तक आते-आते भाजपा सरकार भ्रष्टाचार और नेतृत्व संकट के आरोपों में घिर चुकी थी। पार्टी को फिर वही चेहरा याद आया, जिसकी पहचान साफ-सुथरी राजनीति थी। भुवन चंद्र खण्डूरी दोबारा मुख्यमंत्री बनाए गए। यहीं से जन्म हुआ उस ऐतिहासिक नारे का, जिसे हम ‘खण्डूड़ी हैं जरूरी।’ के साथ जानते आ रहे हैं। यह नारा केवल प्रचार नहीं था, बल्कि भाजपा की उस राजनीतिक आवश्यकता का प्रतीक था, जिसमें उसे जनता के सामने भरोसेमंद चेहरा चाहिए था, मगर यह नारा भाजपा के काम नही आया, भुवन चंद्र खण्डूरी खुद 2012 का विधानसभा चुनाव हार गये और पार्टी को स त्ता गवानी पड़ी।
लोकायुक्त कानून बना कर राष्ट्रीय स्तर पर छा गये थे खण्डूरी
अपने दूसरे कार्यकाल में खण्डूरी ने अपने राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दांव खेला, सशक्त लोकायुक्त कानून बना कर। देश उस समय अन्ना हजारे आंदोलन और भ्रष्टाचार विरोधी लहर से गुजर रहा था। ऐसे माहौल में उत्तराखण्ड में मजबूत लोकायुक्त कानून लागू करने की पहल ने राष्ट्रीय स्तर पर खण्डूरी की छवि को और ऊँचा किया। उनके समर्थक कहते थे कि यदि उन्हें लंबा समय मिलता, तो उत्तराखण्ड की प्रशासनिक संस्कृति बदल सकती थी।
लेकिन राजनीति केवल छवि से नहीं चलती 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने लगभग पूरा चुनाव खण्डूरी की छवि पर लड़ा। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता थी, लेकिन राजनीतिक समीकरण अलग दिशा में चले गए। भाजपा चुनाव हार गई। सबसे बड़ा झटका यह रहा कि स्वयं खण्डूरी भी अपनी सीट नहीं बचा सके। यह उत्तराखण्ड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास बन गया, जिस नेता को पार्टी ने सबसे भरोसेमंद चेहरा माना, वही चुनावी विजय नहीं दिला सका।
सादगी, स्पष्टवादिता और अनुशासन की विरासत
खण्डूरी का जीवन केवल सत्ता की कहानी नहीं, बल्कि मूल्यों की राजनीति का दुर्लभ उदाहरण भी था। वे दिखावे से दूर रहते थे। सार्वजनिक जीवन में सादगी, स्पष्टवादिता और अनुशासन उनकी पहचान रहे। उन्होंने सत्ता को कभी वैभव का माध्यम नहीं बनने दिया। उनके लिए राजनीति जनसेवा का विस्तार थी। पूर्व सैनिक सेवा परिषद, पर्वतीय संस्कृति परिषद, चन्द्रवल्लभ ट्रस्ट और सामाजिक संगठनों के माध्यम से वे लगातार समाज से जुड़े रहे। उन्हें मदर टेरेसा इंटरनेशनल अवॉर्ड सहित कई सम्मानों से सम्मानित किया गया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पूँजी जनता के बीच उनकी ईमानदार छवि रही।
राजनीति में ईमानदारी की कीमत
खण्डूरी को लेकर एक बात उनके विरोधी भी स्वीकार करते थे, कि उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर शायद ही कभी सवाल उठा। लेकिन यही ईमानदारी कई बार राजनीतिक व्यवहारिकता से टकराती रही। वे सत्ता संचालन को प्रशासनिक अनुशासन की तरह देखते थे, जबकि राजनीति रिश्तों, संतुलन और संगठनात्मक प्रबंधन का खेल भी है।कई भाजपा नेताओं को शिकायत रहती थी कि खण्डूरी आसानी से उपलब्ध नहीं होते, फैसले सीमित दायरे में लेते हैं और संगठन की अपेक्षाओं के अनुरूप राजनीतिक संतुलन नहीं साध पाते।
इतिहास में दर्ज रहेगा यह नाम
भुवन चंद्र खण्डूरी का जीवन भारतीय लोकतंत्र में उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने सत्ता को नैतिक जिम्मेदारी माना। वे लोकप्रिय भी रहे, विवादों में भी रहे। वे कठोर प्रशासक भी थे और संवेदनशील जननेता भी। वे भाजपा के संकटमोचक भी बने और चुनावी पराजय का चेहरा भी। लेकिन यह निर्विवाद है कि उत्तराखण्ड की राजनीति जब भी ईमानदारी, प्रशासनिक दृढ़ता और व्यक्तिगत सादगी की चर्चा करेगी, खण्डूरी का नाम सबसे सम्मान के साथ लिया जाएगा।
कल (20 मई 2026) हरिद्वार में जब राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंतिम यात्रा निकलेगी, तब केवल एक नेता को विदाई नहीं दी जाएगी, बल्कि उत्तराखण्ड की राजनीति के उस युग को अंतिम प्रणाम किया जाएगा, जिसने यह विश्वास जीवित रखा कि राजनीति में चरित्र अब भी सबसे बड़ी ताकत हो सकता है। क्योंकि कुछ लोग पद से बड़े होते हैं, और कुछ व्यक्तित्व समय से। भुवन चंद्र खण्डूरी उन्हीं विरल व्यक्तित्वों में से एक थे।
जीवन परिचय
- 1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्म हुआ, प्रारंभिक षिक्षा यही प्राप्त की।
- 1951 से 1953 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विज्ञान की पढ़ाई की।
- 1954 में भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन प्राप्त किया।
- 1957 से 1959 तक पुणे स्थित कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग में सिविल इंजीनियरिंग का अध्ययन किया।
- 1969 में डिफेन्स सर्विसेज स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन व इंग्लैंड के रिज़र्व स्टाफ कॉलेज में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
- 1973-74 में इंस्टिट्यूट ऑफ डिफेन्स मैनेजमेंट, सिकंदराबाद व 1976 में नई दिल्ली स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में उच्च प्रशिक्षण प्राप्त किया।
- 1962 भारत-चीन युद्ध, 1965 के भारत-पाक युद्ध व 1971 के भारत-पाक युद्ध के सहभागी रहे।
- विशिष्ट और समर्पित सेवाओं के सम्मान में भारत सरकार ने 26 जनवरी 1982 को उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया।
- 1991 में पहली बार गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए।
- 1998, 1999, 2004 व 2014 में पुनः लोकसभा सदस्य चुने गए।
- संसद में रहते हुए वित्त, रक्षा, गृह, पेट्रोलियम तथा लोक लेखा समितियों सहित अनेक
- संसदीय समितियों में सक्रिय भूमिका निभाई। अगस्त 2004 से मार्च 2007 तक संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष रहे।
- 7 नवम्बर 2000 को उन्हें भारत सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया।
- 24 मई 2003 को केंद्रीय मंत्रिमंडल में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री बने और 21 मई 2004 तक इस पद पर रहे।
- 12 जुलाई 2003 से 8 सितम्बर 2003 तक शहरी विकास मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला।
- 8 मार्च 2007 को पहली बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 27 जून 2009 तक इस दायित्व का निर्वहन किया।
- 11 सितम्बर 2011 को दूसरी बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने और 13 मार्च 2012 तक इस पद पर रहे।
- 10 जनवरी 2013 को मदर टेरेसा इंटरनेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
- 19 मई 2026 को अंतिम सांस ली।









































