अपनी ही सरकार पर त्रिवेंद्र के तीखे तेवर

Trivendra's sharp attitude towards his own government

देहरादून। बदरीनाथ धाम में कथित दान (चढ़ावा) चोरी के मामले ने अब उत्तराखंड की राजनीति में नया मोड़ ले लिया है। इस विवाद के बीच पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार से भाजपा सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत का बयान भाजपा सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करता नजर आ रहा है। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने न केवल पूरे मामले की निष्पक्ष और भरोसेमंद जांच की मांग की, बल्कि दोषियों को कठोर सजा देने की बात कहते हुए एक बार फिर अपने पुराने और विवादित देवस्थानम बोर्ड के फैसले का खुलकर समर्थन भी किया।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जिस देवस्थानम बोर्ड को तीव्र विरोध के बाद भाजपा सरकार को वापस लेना पड़ा था, उसी बोर्ड की वकालत दोबारा करके त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पार्टी के भीतर पुराने विवाद को फिर से हवा दे दी है। ऐसे समय में जब सरकार बदरीनाथ दान चोरी मामले पर विपक्ष के निशाने पर है, पूर्व मुख्यमंत्री का यह बयान विपक्ष को सरकार को घेरने का नया अवसर दे सकता है।

त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि बदरीनाथ धाम में दान चोरी जैसी खबरें सामने आना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले में ऐसी जांच होनी चाहिए जिस पर हर व्यक्ति विश्वास कर सके। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि जांच में कोई भी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ बिना किसी दबाव के कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

सबसे अहम बात यह रही कि उन्होंने एक बार फिर कहा कि उत्तराखंड के प्रमुख मंदिरों के बेहतर, पारदर्शी और व्यवस्थित संचालन के लिए देवस्थानम बोर्ड होना ही चाहिए। यह वही मुद्दा है, जिस पर भाजपा सरकार को भारी विरोध झेलना पड़ा था और अंततः बोर्ड को समाप्त करना पड़ा था। ऐसे में त्रिवेंद्र का यह बयान भाजपा के भीतर अलग सोच और मतभेदों की चर्चा को भी तेज कर रहा है।

उधर कांग्रेस ने इस पूरे मामले को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने आरोप लगाया कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों पर सवाल उठ रहे हैं, उन्हीं से जुड़े लोगों को जांच समिति में शामिल कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह वैसा ही है जैसे बिल्ली को ही दूध की रखवाली सौंप दी जाए।

गोदियाल ने कहा कि ऐसी जांच समिति से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की जांच विधानसभा की संयुक्त समिति से कराई जाए, जिसकी अध्यक्षता नेता प्रतिपक्ष करें। यदि सरकार इसके लिए तैयार नहीं है तो जांच की निगरानी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश से कराई जाए ताकि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास बहाल हो सके।

कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के पास इस मामले में सख्त कार्रवाई करने का अवसर था, लेकिन पहले केदारनाथ स्वर्ण प्रकरण की तरह इस बार भी सरकार निर्णायक कदम उठाने से बचती दिखाई दे रही है। कांग्रेस का कहना है कि जब मंदिर समिति के अध्यक्ष के निजी सहायकों तक पर गंभीर आरोप लग रहे हों, तब उसी तंत्र से जुड़े लोगों को जांच समिति में शामिल करना जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बदरीनाथ दान चोरी विवाद अब केवल एक प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि भाजपा के भीतर पुराने फैसलों, नेतृत्व की सोच और मंदिर प्रबंधन को लेकर अलग-अलग विचारों को भी सामने ला रहा है। ऐसे में त्रिवेंद्र सिंह रावत का बयान विपक्ष के लिए सरकार पर हमले का बड़ा राजनीतिक हथियार बनता दिखाई दे रहा है।
हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि दान चोरी के आरोपों की जांच अभी जारी है और किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी आधिकारिक जांच पूरी होने से पहले स्थापित नहीं हुई है।

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