उत्तराखंड का धर्मांतरण विरोधी कानून अदालतों में ध्वस्त

Uttarakhand anti-conversion law struck down in courts

देहरादून। भाजपा शासित उत्तराखंड में जिस धर्मांतरण विरोधी कानून को “सामाजिक सुरक्षा” का हथियार बताकर लागू किया गया था, वही कानून अब अदालतों में एक के बाद एक ढहता जा रहा है। सात साल के भीतर दर्ज 62 मामलों में से सिर्फ 5 ही पूरे ट्रायल तक पहुँचे — और हैरान करने वाली बात यह कि इन पाँचों में भी सभी आरोपी बरी हो गए।

यानी न सबूत, न गुनाह, सिर्फ गिरफ्तारियाँ और जेल। यह खुलासा इंडियन एक्सप्रेस की विस्तृत जांच और आरटीआई से जुटाए गए आधिकारिक आंकड़ों में हुआ है, जो भाजपा सरकार के उस पूरे नैरेटिव को कठघरे में खड़ा करता है, जिसके सहारे वह “जबरन धर्मांतरण” का डर दिखाती रही।

उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (UFRA) के तहत दर्ज मामलों में अदालतों ने बार-बार यही कहा कि, जबरदस्ती या लालच का कोई ठोस सबूत नहीं है। रिश्ते आपसी सहमति से बने थे। पुलिस जांच में गंभीर खामियाँ थीं। बयानों में विरोधाभास था।

कम से कम 7 मामले बीच में ही खत्म हो गए, क्योंकि शिकायतकर्ता अपने ही बयान से पलट गए या अभियोजन आरोप साबित ही नहीं कर पाया। शेष 39 मामलों में अधिकतर आरोपी ज़मानत पर बाहर हैं, जिनमें कई को हाई कोर्ट और एक को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली।

अमन सिद्दीकी उर्फ अमन चौधरी का मामला इस कानून के दुरुपयोग की जीती-जागती मिसाल है। दोनों परिवारों की रजामंदी, हलफ़नामा कि धर्म परिवर्तन नहीं होगा — फिर भी अमन को करीब छह महीने जेल में रहना पड़ा।

19 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा: “राज्य सरकार को ऐसी अंतरधार्मिक शादी पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती जो दोनों की मर्ज़ी और परिवार की सहमति से हुई हो।” यह टिप्पणी सीधे-सीधे सरकार की नीयत और कार्रवाई पर सवाल थी। बाद में हाई कोर्ट ने पूरे मामले की कार्यवाही पर रोक लगा दी।

जब शिकायत करने का भी हक नहीं था, तब भी मुकदमे दर्ज जिन पाँच मामलों में ट्रायल पूरा हुआ, उनमें से दो में शिकायत ऐसे लोगों ने की जिनका कथित धर्मांतरण से कोई लेना-देना ही नहीं था, जबकि कानून साफ कहता है कि शिकायत सिर्फ पीड़ित या उसके नज़दीकी परिजन ही कर सकते हैं।

  • टिहरी में फेसबुक वीडियो के आधार पर ईसाई धर्म की तारीफ को “धर्मांतरण” बता दिया गया — सबूत फेल, आरोपी बरी
  • रामनगर में “बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन” का आरोप — किसे, कैसे, कब? अभियोजन के पास जवाब नहीं
  • रानीखेत और अन्य मामलों में महिलाएँ खुद अदालत में बोलीं — हम अपनी मर्ज़ी से गए थे
  • रेप, अपहरण, पॉक्सो — आरोप जोड़ो, डर पैदा करो
  • कुल 24 मामलों में धर्मांतरण के साथ बलात्कार या अपहरण की धाराएँ जोड़ी गईं।
  • अदालतों ने 16 मामलों में कहा कि रिश्ते आपसी सहमति से थे या जांच ही संदिग्ध थी।
  • कई मामलों में कथित पीड़ितों ने अपने बयान बदल दिए।
  • कुछ मामलों में आरोपियों ने उगाही और ब्लैकमेलिंग तक के आरोप लगाए।
  • सुरक्षा मांगो, तो मुकदमा झेलो
  • विडंबना यह कि कुछ अंतरधार्मिक जोड़ों ने जब अपने परिवार से सुरक्षा की गुहार लगाई, तो उल्टा उन्हीं पर कानून थोप दिया गया।
  • धर्म परिवर्तन की सूचना जिला मजिस्ट्रेट को न देने के आरोप में पाँच मामले दर्ज हुए, जिनमें से चार में अदालत ने गिरफ्तारी पर रोक लगा दी।
  • इसके उलट, अदालतों के फैसले यह उजागर कर रहे हैं कि बिना सबूत लोगों को जेल भेजा गया
  • ज़मानत को सज़ा बना दिया गया
  • निजी रिश्तों को अपराध घोषित किया गया
  • सरकार इसे सुरक्षा कवच कहती रही, लेकिन हकीकत यह है कि उत्तराखंड का धर्मांतरण विरोधी कानून अदालतों में बार-बार नंगा हो रहा है — और हर बार सवाल सिर्फ धर्मांतरण का नहीं, बल्कि कानून के दुरुपयोग और सत्ता की मंशा का बनकर सामने आ रहा है।

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