हजार स्वर्ण मंदिरों का शहर है कांचीपुरम

Kanchipuram is city of a thousand golden temples

डॉ. लोकेन्द्र सिंह

हिन्दू आस्था का प्रमुख केंद्र है तमिलनाडु का कांचीपुरम। हिन्दू वाङ्ग्मय में मोक्षदायिनी सप्तपुरियों का वर्णन आता है, उनमें कांचीपुरम भी शामिल है। अर्थात् कांची मोक्ष की भूमि है। ज्ञान-वैराग्य की भूमि है। संभवत: यही कारण है कि कांची को दक्षिण भारत की काशी भी कहते हैं। यह सप्तपुरियां भगवान शिव और विष्णु में बराबर-बराबर बंटी हैं।

सप्तपुरियों को आधा-आधा कैसे बाँटें, तब इसका रास्ता निकाला गया कि कांची नगरी आधी विष्णु को और आधी शिव को समर्पित कर दी जाए। इस प्रकार कांचीपुरम के दो भाग हैं- शिवकांची तथा विष्णुकांची। कांचीपुरम प्राचीन मंदिरों का शहर है। एक-दो नहीं अपितु यहाँ अनेक मंदिर हैं, जिनका द्रविण शैली का स्थापत्य देखते ही बनता है। कांचीपुरम को ‘हजार मंदिरों का शहर’ या ‘हजार मंदिरों का स्वर्ण नगर’ और ‘द गोल्डन सिटी ऑफ़ 1000 टेंपल’ भी कहा जाता है। यहाँ आज भी लगभग 126 भव्य-दिव्य मंदिरों के दर्शन किए जा सकते हैं।

अपनी कांचीपुरम की यात्रा में हमने यहाँ के चार प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए- कामाक्षी अम्मन मंदिर, एकाम्बरेश्वर मंदिर, वरदराज पेरुमल मंदिर और उलगलंथा पेरुमल मंदिर। चेन्नई के दक्षिण-पश्चिम में पलार नदी के किनारे स्थित कांचीपुरम अपने रेशम के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे ‘कांजीवरम’ कहा जाता है। यहाँ आसपास के गाँवों में आज भी घर-घर में हथकरघे लगे हैं, जहाँ स्त्री के सौंदर्य को कई गुना बढ़ाने वाली रेशम की साड़ियाँ बुनी जाती हैं।

कभी चोल, पल्लव और विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहे कांचीपुरम की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक विरासत के साथ हमने तीन दिन गुजारे। श्रीकांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री विजेंद्र सरस्वती कहते हैं कि कांचीपुरम में दो-तीन दिन रहने से पुण्य प्राप्त होता है। पुण्य के साथ हम अविस्मरणीय आनंद भी प्राप्त किया।

कामाक्षी अम्मन मंदिर, कांचीपुरम का प्रमुख तीर्थस्थल है। देशभर से श्रद्धालु यहाँ माँ पार्वती के अवतार कामाक्षी माता के दर्शन करने के लिए आते हैं। पद्मासन में विराजमान कामाक्षी अम्मन, कांची की अधिष्ठात्री देवी हैं। कामाक्षी मंदिर को शक्तिपीठ माना जाता है, जहाँ देवी सती की नाभि गिरी थी।

कामाक्षी मंदिर में गर्भगृह को गायत्री मंडप कहते हैं। गर्भगृह के ऊपर स्वर्ण गोपुरम् है, जो पूरे वैभव के साथ अध्यात्म और समृद्धि की चमक बिखरेता है। प्रवेश द्वार पर एक विशाल ध्वजस्तंभ या जयस्तंभम् है, जो विजय का प्रतीक है। यह जयस्तम्भ भी स्वर्ण आभा के साथ चमकता है। माँ कामाक्षी के सम्मुख श्रीचक्र बना है, जिसके शीर्ष पर वे प्रकटरूप में विराजी हैं। कहते हैं कि स्वयं जगद्गगुरु आदि शंकराचार्य ने शिला पर इस श्रीचक्र को उकेरा था और यहीं उन्होंने देवी पर सौंदर्यलहरी की रचना की थी।

मंदिर का स्थापत्य बहुत भव्य है। इसकी दीवारों एवं खम्बों पर की गई नक्काशी देखते ही बनती है। यह नक्काशी भारत की एकात्मता को भी प्रकट करती है। दीवारों पर रामायण के प्रसंगों को उकेरा गया है। महाविष्णु के अवतार श्रीराम के जन्म के प्रसंग के साथ ही तीनों माताओं- कौशल्या, सुमित्रा, केकई और पिता महाराज दशरथ का शिल्प भी है।

माता सीता की खोज में लंका पहुँचे श्रीहनुमान भी दशाशन के सामने बैठे दिखायी दे जाएंगे। यानी मंदिर की दीवारें रामकथा सुनाती हुई प्रतीत होंगी। यहाँ आप कल्याण मंडप भी देख पाएंगे, जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ। इसके दृश्यों को मंडप की दीवारों एवं खम्बों पर आप देख सकते हैं। शिवलिंग का आलिंगन किए माँ पार्वती (कामाक्षी देवी) का शिल्प भाव-विभोर कर देता है।

कामाक्षी मंदिर से थोड़ी दूरी पर ही एकाम्बरेश्वर मंदिर है, जिसे एकम्बरनाथ मंदिर भी कहते हैं। यह कांचीपुरम का सबसे बड़ा मंदिर है, जो लगभग 20 एकड़ में फैला हुआ है। गोपुरम् पर रंगों का संयोजन आकर्षित करता है। यह मंदिर महादेव को समर्पित है। एकाम्बरेश्वर शिवलिंग बालू से बना है, जिसे पृथ्वी लिंगम या बालुका लिंगम कहते हैं। मान्यता है कि इस शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा माता पार्वती ने की थी।

उन्होंने महादेव से विवाह करने के लिए यहाँ आम के पेड़ के नीचे तपस्या की। मंदिर परिसर में स्थित लगभग 3500 वर्ष प्राचीन आम्रवृक्ष उस दैवीय प्रसंग के साक्षी के रूप में उपस्थित है। मंदिर के परिक्रमा पथ में अनेक शिवलिंग देखे जा सकते हैं। ये सभी शिवलिंग एक ही पत्थर से बनाए गए हैं। दक्षिण भारत के अन्य मंदिरों की भाँति यहाँ भी दीवारों और खंबों पर सुंदर नक्काशी की गई है। कई मूर्तियां इतनी सजीव हैं कि मानो अभी बोल ही पड़ेंगी। मंदिर के भीतर एक हजार खंभों वाला मंडप भी इस परिसर को विशिष्ट बनाता है।

पेरुमल का अर्थ है ‘महान भगवान’। यह शब्द तमिल भाषा के ‘पेरुम’ (महान) और ‘माल’ (ईश्वर) से बना है। मुख्य रूप से दक्षिण भारत में भगवान विष्णु के लिए उपाधि के रूप में ‘पेरुमल’ शब्द का प्रयोग होता है। इसी तरह, ‘वरदराज’ का अर्थ है ‘वरदानों का राज’। इसका उपयोग भी भगवान विष्णु के लिए किया जाता है।

‘वरदराज पेरुमल मंदिर’ में भगवान विष्णु को देवराजस्वामी के रूप में पूजा जाता है। सन् 1053 में चोलों ने वरदराज पेरुमल मंदिर बनवाया था। यहाँ 9 फीट ऊंची भगवान विष्णु की अद्भूत मूर्ति है। वरदराज पेरुमल मंदिर के प्रवेश द्वार से जैसे ही हम परिसर में प्रवेश करते हैं, हमें बायीं ओर 100 खंभों वाला एक मंडप दिखायी देता है। इसके खंबों पर की गई कारीगरी अद्भुत है। क्या कारीगर रहे होंगे, जिन्होंने पत्थर को तराशकर अचंभित करनेवाली सांकर (जंजीर) बना दी। मंडल के कंगूरे पर लटकी जंजीर को देखकर आप अंदाजा ही नहीं लगा सकते कि यह लोहे या अन्य धातु की न होकर पत्थर की सांकर है।

‘उलगलंथा पेरुमल’ का अर्थ है ‘ब्रह्मांड को मापने वाला भगवान’। यह नाम भगवान विष्णु के पाँचवे अवतार ‘वामन अवतार’ से जुड़ता है। भगवान वामन को समर्पित मंदिर बमुश्किल ही आपने देखे होंगे। उलगलंथा पेरुमल मंदिर कांचीपुरम के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है। इतिहासकार बताते हैं कि मंदिर का निर्माण राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044 ई.) ने कराया था। मंदिर का गोपुरम् आकर्षक है। जब हम गर्भगृह में पहुँचते हैं तब हमारे सामने भगवान वामन अपने विराट स्वरूप में दिखायी देते हैं। मूर्ति 35 फीट ऊँची है, जिसमें भगवान वामन का बायाँ पैर ऊँचा उठा हुआ है और दायाँ पैर राजा बलि के सिर पर टिका हुआ है।

कांचीपुरम के ऐतिहासिक, प्राचीन और सांस्कृतिक महत्व के मंदिरों के वातावरण में सकारात्मक दिव्य ऊर्जा की अनुभूति आप कर सकते हैं। हम यह तो नहीं कहेंगे कि मौसम की अनुकूलता को ध्यान में रखकर आप केवल अक्टूबर से फरवरी के बीच ही यहाँ आएं। जब आपको लगे कि कांचीपुरम होकर आना चाहिए, तभी यहाँ चले आईए। कांचीपुरम के उत्सव एवं मंदिरों की परंपराओं की जानकारी लेकर आएंगे तो सांस्कृतिक विरासत के भी साक्षी एवं सहभागी बनने अवसर आपको मिल सकता है।

डॉ. लोकेन्द्र सिंह (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं और पर्यटन लेखन में विशेष रुचि रखते हैं।)

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