नया परिवेश, नया परिवार : ओडिशा हम्मार

गौरव अवस्थी (यात्रा संस्मरण)

2 महीने पहले श्रीयुत् अशोक पुजाहरी जी की कॉल आई-‘ कविजी (पद्मश्री हलधर नाग को कोसल क्षेत्र में आपसी बोलचाल में यही संबोधन देते हैं) के काव्य पर नेशनल सेमिनार कर रहे हैं, आपको भी आना है’। उस वक्त इस फोन कॉल का कोई खास मतलब नहीं निकाल पाया। ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, आमंत्रण उतना ही गहराता गया। कोई 15 दिन पहले टिकट के लिए फिर कॉल आई-‘ कहा गया, अपना आधार कार्ड भेज दीजिए।’ आदेश का पालन करना ही था। डेट लाॅक हुई। फिर एसएन पांडा जी ने व्हाट्सएप पर टिकट भेज दिया। पांडा जी से कोई परिचय नहीं पर उनके आग्रह में विनम्रता थी। पांडा जी कोई साधारण इंसान नहीं, कृष्णा विकाश ग्रुप ऑफ़ इंस्टिट्यूट्स की बरगढ़ ब्रांच के डायरेक्टर हैं। ओडिशा और छत्तीसगढ़ का यह बड़ा शैक्षणिक ग्रुप है। विभिन्न शहरों में इसकी 22 शाखाएं हैं और रायपुर में पहला विश्वविद्यालय बन रहा है। इसके संस्थापक तेलुगु भाषी डी मुरली कृष्णा हैं। अब संबलपुरी। पांडाजी से भी ज्यादा विनम्र और सरल।

खैर, बात आई-गई। बरगढ़ यात्रा सर पर सवार थी और सर पर आ भी गई! ज्यों-ज्यों तारीख नजदीक आती जा रही थी, मन में कई तरह के सवाल उठने लाजमी थे। उठे भी। मथे भी। वह दिन भी आ गया और समय भी, जब यात्रा पर निकलना था। मन में अनेक संशय। सबसे ज्यादा भाषा को लेकर। उहापोह। कैसे क्या करेंगे? बैसवारे (अवध अंचल के रायबरेली-उन्नाव का एक क्षेत्र विशेष) की नाक बचेगी या कटेगी! क्यों? क्योंकि हम ठहरे पत्रकार। पेपर में लिखते तो उमर बीत गई पर ‘पेपर प्रेजेंटेशन’ का कोई अनुभव कहां? वैसे भी, पेपर-वेपर का काम तो विद्वानों और प्रोफेसरों का है। पत्रकार को इससे क्या मतलब? फिरभी, अपने मन मुताबिक विषय पर एक टूटा-फूटा आलेख जरूर तैयार किया। वही आधार था।

मन अनमना। हिम्मत डाट निकल पड़े एक नई दुनिया से साक्षात्कार करने। मन में धुकधुकी। तन में झुरझुरी। बार-बार मन में आए- अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा? मना क्यों न कर दिया? आदि..आदि..।। लखनऊ से यात्रा शुरू होने के पहले ही सचिन चौधरी का फोन आया-‘ मैं आपको एयरपोर्ट के बाहर मिलूंगा.. गाड़ी नंबर फलां-फलां..। कृष्णा विकाश संस्थान के मैनेजर HR किरन आचार्य जी ने भी बात की। रात पहुंचने के समय हम लखनऊ में ही थे। महानदी कोल्डफील्ड्स में महाप्रबंधक साहित्यकार-अनुवादक डाॅ दिनेश कुमार माली जी फोन पर पूछे-कहां हैं? फ्लाइट लेट होने की बात जान कर उन्होंने अनुमति के अंदाज में पूछा-‘ फिर हम लोग डिनर कर लें? 9:40 की फ्लाइट रात 11 बजे झारसुढ़ा पहुँची। स्टार एयर के इस क्राफ्ट में 80 फ़ीसदी सीटें खालीं। क्राफ्ट के अनाउंसमेंट से ही पता चला कि स्टार एयर की यह सर्विस ओडिशा सरकार द्वारा दिए जा रहे अनुदान से संचालित है। ओडिशा के पश्चिमी भाग को देश दुनिया से जोड़ने के लिए “न्यू डेस्टिनेशन पॉलिसी” ने यह एयरपोर्ट दिया और कुछ फ्लाइट्स भी।

ओडिशा के इस औद्योगिक शहर में अभी कोरोना काल में ही नया एयरपोर्ट बना है। कोई भीड़भाड़ नहीं। बाहर 2-4 टैक्सी वाले। टैक्सी बुकिंग बूथ खुला हुआ। दो एक साथी यात्रियों ने टैक्सी बुक कराईं। बाकी को लेने के लिए उनकी अपनी गाड़ियां आई हुई थीं, जैसे हमें। यहां वेदांता समूह का बड़ा पावर प्लांट है। किलोमीटरों फैला हुआ। बीच में पड़ने वाले संबलपुर में महानदी कोलफील्ड्स का मुख्यालय। बाहर ही सचिन चौधरी मिल गए। सारथी श्रेष्ठ थे दीपक प्रधान। झारसुढ़ा से बरगढ़ की दूरी 100 किलोमीटर है। रास्ते में सचिन और दीपक भाई से बातचीत में ही संशय के पहाड़ पिघलने लगे। बातों-बातों में इस क्षेत्र विशेष की खूबी और खासियत पता चलनी शुरू हो गईं। दिन लखनऊ में बिना कुछ ठोस खाए बीता था, इसलिए भूख अपने पर। सचिन ने खाने को पूछा तो कट्टी साध गए। हां न ना! सचिन भाई ने ‘मौन’ सहमति मानी और रात 12 बजे एक ढाबे के बाहर कार के पहिए रुक गए। नाम था-‘बीकानेर वाले चौधरी दा ढाबा’। इतनी दूर ओडिशा में राजस्थानी ढाबा! पापी पेट जो न कराए। कहां-कहां भगाए? वेटर से खानपान समझा। अंतत: हाफ प्लेट पीली दाल और हाफ प्लेट सब्जी मंगाने में ही भलाई समझी। हाफ प्लेट में ही इत्ती क्वांन्टिटी कि तीन लोग भरपेट खाएं। ढाबा मालिक ठहरे बीकानेर वाले तो सब्जी स्पाइसी होनी ही थी। थी भी।

बरगढ़ पहुंचते-पहुंचते बज गए रात के एक। पहुंचने के पहले ही रूम पार्टनर डॉ सी जयशंकर बाबू के मोबाइल से घंटी घनघनाई-‘ कमरा अंदर से लॉक नहीं है।आपके लिए दरवाजे खुले हैं।’ श्री जयशंकर जी पांडिचेरी विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष हैं। माली जी के माध्यम से उनसे फोन पर बातचीत पहले की थी। आमने-सामने की पहली मुलाकात यहीं होनी थी। रात गहरा जाने के चलते कमरे के अंदर पहुंचने पर सिर्फ औपचारिक हाय हेलो!! आंखों पर गमछा ढांपे वह सो गए और हम भी। बगल के कमरे में माली जी और उनकी धर्मपत्नी शीतल भाभी थीं। अंगुल (भुवनेश्वर) से प्रोफेसर शांतनु कुमार भी सपत्नीक (ऊषा भाभी) माली जी के साथ इस सेमिनार का हिस्सा बनने आए हैं। सुबह यह सुनकर थोड़ी तसल्ली हुई। उनसे पहले का परिचय था क्योंकि प्रोफेसर शांतनु 2022 के ‘द्विवेदी मेले’ में रायबरेली आ चुके थे। अलसाई सुबह को शुरू हुई चहल-कदमी और चाय पर मेल-मुलाकात का दौर।

डॉ माली ने पहला परिचय कराया-‘यह हैं कालिंदी कॉलेज (नई दिल्ली) की प्रोफेसर आरती पाठक और आप नागपुर से डॉ पूनम मिश्रा’। औपचारिक अभिवादन और चाय की चुस्की के बीच हलधर नाग की कविताओं का अंग्रेजी में सबसे पहले अनुवाद करने वाले श्री सुरेंद्रनाथ भी आ गए। सबसे प्रारंभिक परिचय ही प्रगाढ़ता की ओर ले चला। बातों-बातों में संशय के बादल छंटने लगे। थोड़ी देर की औपचारिकता के बाद नए परिवेश में नया परिवार सा बनने लगा। ओडिशा का यह इलाका छत्तीसगढ़ से लगा हुआ है। इस इलाके में हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या पर्याप्त है। या यों कहें, सब हिंदी बोलते समझते हैं। कोसली-संबलपुरी भाषा के शब्दों में हिंदी ऐसे मिक्सड है जैसे दाल में नमक या चाय में चीनी। इसीलिए भुवनेश्वर वाले कोसली भाषा को अपने परिवार की भाषा नहीं मानते। ओड़िया क्लिष्ट भाषा है और कोसली देशज रूप लिए। कहा जाता है कि कोसली के कई शब्दों के अर्थ ओड़िया भाषी नहीं समझ पाते!! ओड़िया समाज कोसली को बोली मानता है और संबलपुरी समाज भाषा। भाषा के आधार पर क्षेत्रीय संघर्ष की सुगबुगाहट भी जब-कब सुनाई पड़ जाती है। ऐसे में राजनेताओं को संतुलन बनाने में कड़ी कवायद करनी पड़ती ही रहती है। यह उद्घाटन सत्र में मंत्री-सांसद के संबोधन में झलकी भी।

इस इलाके में रात से बारिश हो रही थी। सुबह भी बूंदाबांदी चरम पर थी। गेस्ट हाउस के बारिश में नहाए हरे-भरे परिसर को अपने मोबाइल कैमरे में हर कोई कैद करने की कसरत में जुटा था। चाय पीकर नहाने-धोने की तैयारी ही थी कि सेमिनार की मुख्य आयोजक संस्था अभिमन्यु साहित्य सांसद (घेंस) के सर्वेसर्वा अशोक पुजाहरी के सहायक प्रोफेसर पुत्र शुभ्र सौरांशु और सोभा प्रधान लोककवि रत्न हलधर नाग को लेकर गेस्ट हाउस में दाखिल होते हैं। कविजी अपनी पारंपरिक वेशभूषा धोती-बनियान में। हाथ में एक झोला। सेमिनार के उद्घाटन का घोषित टाइम 9 बजे का था। वास्तविक 10 बजे। सुई 10.15 पर पहुंची होगी, अशोक जी का फोन आया- सभागार में आ जाइए। मंत्री जी ( केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान एवं राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री सूरज सूर्यवंशी) आने वाले हैं। गेस्ट हाउस से सभागार बस 50 कदम दूर। तैयार होकर हम सब थोड़ी ही देर में सभागार में हाजिर।
हालांकि, मंत्री-सांसद आए वह 12 बजे। नेताओं का लेट आना दस्तूर है। दूसरे शब्दों में मजबूरी!!

सभागार में साहित्य संसद के सुशांत कुमार मिश्रा की लपककर मिलने की अदा मन को भा गई। फिर शुरू हुआ औपचारिक परिचय..आईआईएम-संबलपुर के प्रोफेसर सुजीत पुरसेठ, केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक राजमणि साहू, प्रोफेसर बलराम पांडा, सामाजिक कार्यकर्ता उमेश प्रधान, संगीतज्ञ सुरेंद्र साहू, हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विवि गढ़वाल के शोधछात्र एवं कोसल प्रदेश निवासी दिवाकर साहू, गढ़वाल विवि की शोधार्थी पी अंजलि..आदि। सब बौद्धिकता से भरपूर। प्रोफेसर सुजीत हैं तो अर्थशास्त्र के प्रोफेसर लेकिन कमाल के इतिहासज्ञ। क्षेत्र का इतिहास जुबान पर। राजमणि जी ओजस्वी वक्ता-कवि दोनों।

New environment new family

2 दिन तक चले इस सेमिनार के पांच सत्रों और हलधर संगीत संध्या में विभिन्न तबकों और बच्चों से मेल मुलाकात ने सैकड़ो किलोमीटर की दूरी को दरकिनार कर दी। मिनी हलधर नाग बने अस्मी पांडा हों या कवि की कविता अछिया (अछूत) पर आधारित नृत्य नाटिका में शबरी की भावभरी भूमिका निभाने वाली छात्रा स्नेहानाथ या वैष्णवी साहू या अन्य। सबसे मिलकर फोटो खिंचाई ताकि सनद रहे..। मन में उमंग थी। तरंग थी। उत्साह था। उछाह था। सेमिनार के समापन के बाद घेंस (हलधर नाग का जन्मस्थान और अशोक जी का पैतृक स्थान) की यात्रा कोसल प्रदेश से नजदीकियों के अहसासों से भर गई। बैदेही भाभी ( श्री अशोक पुजाहरी जी की धर्मपत्नी) की सपरिवार आत्मीय आवभगत कैसे भूली जा सकती है। इस स्थान का सत्तावनी क्रांति ( प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857) का वैसा ही इतिहास जैसे अवध के रणबांकुरों का। ओडिशा के पश्चिमांचल में शामिल 10 जनपद के लोग अपने को कोसलवासी कहते हैं। कोसल का अर्थ है मां कौशल्या का घर। भगवान राम की ननिहाल। इस लिहाज से भी हम अवधपुरीवासी अपने ननिहाल में थे। थोड़ा समय बीतते और इतिहास समझते ही मन में उबाल आया-ननिहाल में क्या शर्माना? क्या सकुचाना?

सेमिनार के उद्घाटन सत्र में ज्यादातर के संबोधन कोसली में ही हुए। कोसली एक तरह से हिंदी की सहोदरी ही है। कोसली भाषा को अगर आप ध्यान से सुनें तो उद्बोधन के अर्थ आसानी से समझ आ जाते हैं। 48 घंटे के संग-साथ में एक नए परिवार का निर्माण नि:संदेह इस जीवन की उपलब्धि है। संकोच के सारे तटबंध टूट गए और अनौपचारिक बातों ने दिल को दिल से मिला दिया।
वह एक मशहूर शेर ऐसा ही है न-
हम अकेले ही चले थे जानिबे मंजिल मगर
लोग जुड़ते गए औ कारवां बन गया..
बरगढ़-ओडिशा के इस सफर के बाद इस शेर में हम बदलाव कर रहे हैं, मुआफी के साथ-
‘लोग मिलते गए और परिवार बन गया..’
पता नहीं क्यों हमें, कारवां ‘कौरव’ फेमिली का लगता है और परिवार ‘पांडवों’ का..सही हो तो समर्थन करें अन्यथा क्षमा..!!

गौरव अवस्थी
9415034340

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